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चंदौली में मिसाल बनी गंगा-जमुनी आस्था,मुस्लिम परिवार पिछले 25 सालों से निभा रहा छठ व्रत,परंपरा बनी सौहार्द की प्रतीक

उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले में सूर्य उपासना का महापर्व छठ न केवल हिंदू समुदाय के लिए आस्था का प्रतीक है, बल्कि यहां यह पर्व गंगा-जमुनी तहजीब और सामाजिक सौहार्द की भी मिसाल बन चुका है।यहां एक मुस्लिम परिवार पिछले 25 वर्षों से इस पर्व को पूरी श्रद्धा और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाता आ रहा है। यह परिवार धर्मनिरपेक्ष भारत की उस खूबसूरत तस्वीर को पेश करता है, जहां आस्था इंसानियत से जुड़ी है, न कि मज़हब से।

यह परंपरा चकिया तहसील क्षेत्र के सैदूपुर निवासी डॉक्टर रुस्तम कुतुबुद्दीन की पत्नी और राइजिंग सन वर्ल्ड स्कूल, मवैया की प्रबंधक परवीन वारसी के परिवार में निभाई जा रही है। वर्तमान में परवीन वारसी का परिवार मुगलसराय बाईपास के पास निवास करता है और पिछले कई वर्षों से मुगलसराय के पोखरे पर छठ पर्व आयोजित कर रहा है।

परवीन वारसी ने बताया कि इस व्रत की शुरुआत उनकी मां नाजमा बेगम ने करीब 25 साल पहले की थी। उस समय पुत्र प्राप्ति की कामना में उन्होंने यह व्रत शुरू किया था। बेटे के जन्म के बाद यह परंपरा परिवार की आस्था का हिस्सा बन गई।अब उम्र बढ़ने के कारण नाजमा बेगम की जगह उनकी बड़ी बेटी परवीन वारसी ने यह जिम्मेदारी संभाल ली है। वह 2018 से लगातार छठ का कठिन व्रत रखती आ रही हैं और ढलते एवं उगते सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत का समापन करती हैं।

परवीन वारसी का कहना है,

“हमारे लिए परिवार सबसे पहले है। अगर किसी व्रत को रखने से घर में खुशहाली आती है, तो इसमें गलत क्या है? यह हिंदू या मुस्लिम का पर्व नहीं, बल्कि आनंद और एकता का पर्व है। इससे समाज में प्रेम और अमन-चैन बढ़ता है।”
परिवार पहले चकिया के मां काली मंदिर पोखरे और चंदौली मुख्यालय स्थित साव जी पोखरे पर पूजा करता था, जबकि इस वर्ष यह पर्व मुगलसराय के एक पोखरे पर आयोजित किया गया।परवीन वारसी और उनके परिवार की यह अनूठी आस्था इस बात का प्रमाण है कि श्रद्धा और संस्कार किसी धर्म की सीमाओं में नहीं बंधे होते।यह परिवार भारत की उस सांस्कृतिक विरासत की मिसाल है, जहां विविधता में एकता ही सबसे बड़ी ताकत है।

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