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Chandauli News-अधिवक्ताओं के वर्षों के संघर्ष का परिणाम है चन्दौली जिला न्यायालय भवन का शिलान्यास-धर्मेंद्र तिवारी

चन्दौली जिले के अधिवक्ताओं ने पिछले वर्ष चन्दौली के विकास पुरुष पंडित कमलापति त्रिपाठी की प्रतिमा का अभिषेक कर जनपद न्यायालय भवन के लिए आशीर्वाद मांगा था। पंडित कमलापति त्रिपाठी के आशीर्वाद और अधिवक्ताओं एवं जनपदवासियों के लंबे संघर्ष के परिणामस्वरूप आज जिला न्यायालय भवन का शिलान्यास संभव हो सका। यह बात अधिवक्ता धर्मेन्द्र तिवारी ने कही।
भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा जिले में जिला न्यायालय भवन का शिलान्यास किया गया। उल्लेखनीय है कि विगत 28 वर्षों से जिले में समुचित न्यायालय भवन और उसके परिसर के अभाव में अधिवक्ताओं को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था। न्यायालय भवन की मांग को लेकर जिले के अधिवक्ताओं ने लंबे समय तक आंदोलन, धरना एवं प्रदर्शन किया। इसी क्रम में पंडित कमलापति त्रिपाठी पार्क में उनकी प्रतिमा का अभिषेक कर प्रायश्चित (क्षमा प्रार्थना) कार्यक्रम भी किया गया।अधिवक्ताओं ने जनप्रतिनिधियों की उदासीनता से आहत होकर पंडित कमलापति त्रिपाठी की प्रतीकात्मक शवयात्रा भी निकाली। इस लंबे संघर्ष में जिला कांग्रेस कमेटी ने अधिवक्ताओं के आंदोलन को मजबूती से समर्थन दिया। कांग्रेस के तत्कालीन प्रांतीय अध्यक्ष एवं पूर्व मंत्री अजय राय ने न केवल समर्थन किया, बल्कि स्वयं भी धरना-प्रदर्शनों में शामिल हुए और संबंधित अधिकारियों को पत्र लिखकर अधिवक्ताओं की मांग को आगे बढ़ाया। कांग्रेस के सहयोग एवं समर्थन के लिए जिले की डिस्ट्रिक्ट एवं सिविल बार एसोसिएशन ने धन्यवाद पत्र भी दिया।जिले में बहुमंजिली, सर्वसुविधायुक्त वकीलों के चेम्बर, पार्क सहित इंटीग्रेटेड कोर्ट का निर्माण अधिवक्ताओं, कांग्रेसजनों और जनपदवासियों के संघर्ष की जीत है। धर्मेन्द्र तिवारी ने कहा कि पंडित कमलापति त्रिपाठी ने चन्दौली के विकास की मजबूत नींव रखी और कांग्रेसजन आगे भी जिले के विकास के लिए सदैव सहयोग को तत्पर रहेंगे।


वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ० नारायण मूर्ति ओझा ने कहा कि चन्दौली में जनपद न्यायालय का शिलान्यास कोई राजनीतिक उपलब्धि नहीं, बल्कि एक संवैधानिक दायित्व है। कुछ लोग इस शिलान्यास को लेकर राजनीतिक श्रेय लेने का प्रयास कर रहे हैं, जो न केवल तथ्यहीन है बल्कि भारतीय संविधान की मूल भावना के भी विपरीत है। न्यायालयों की स्थापना किसी मंत्री, विधायक या सांसद की इच्छा से नहीं होती, बल्कि यह पूर्णतः न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र में आती है। इसकी संस्तुति उच्च न्यायालय करता है तथा आवश्यकता, पद सृजन और क्षेत्राधिकार संवैधानिक प्रक्रिया से तय होते हैं। राज्य सरकार की भूमिका केवल प्रशासनिक एवं वित्तीय औपचारिकताओं तक सीमित रहती है। कार्यपालिका और न्यायपालिका को मिलाना संविधान की आत्मा के विरुद्ध है, क्योंकि न्यायालय किसी नेता की कृपा नहीं, बल्कि नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है।उन्होंने कहा कि यह शिलान्यास अधिवक्ताओं के वर्षों के संघर्ष का परिणाम, न्यायिक आवश्यकता की स्वीकृति और संविधान के अनुच्छेद 50 की भावना का सम्मान है।
अधिवक्ता  शशीनाथ उपाध्याय ने कहा कि इसे राजनीतिक प्रचार का विषय बनाना और श्रेय लेने की होड़ मचाना लोकतांत्रिक मूल्यों पर सीधा प्रहार है। न्याय सत्ता से नहीं, संविधान से चलता है। न्यायालय उद्घाटन से नहीं, बल्कि न्यायिक स्वीकृति से बनता है।


इस अवसर पर डॉ० नारायण मूर्ति ओझा, हीरालाल शर्मा, शशीनाथ उपाध्याय, राहुल सिंह भवानी, प्रदीप मिश्रा, शिव शंकर राय, राकेश सिंह, चंद्रवंश यादव, अभिषेक मिश्रा, करुणा तिवारी, अरविंद तिवारी, अखिलेश पांडेय, दशरथ चौहान, प्रज्ञा दीप पांडेय एवं अजीत गिरी सहित अनेक अधिवक्ता व गणमान्य लोग उपस्थित रहे।

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